संकल्प का उत्तराधिकारी

आज देखा मैंने वो गिरा नीम का पेड़
क्रमश: सूखता हुआ
उखड गया था जो एक दिन तूफ़ान में.
गिरते हुए भी उसने संकल्प ना छोड़ा रक्षा का
उस खोखे का सहारा भी उसने ना लिया
जिसको उसने बरसों बचाया धूप से, पानी से और आंधी से.
आखिर उसने क्यों नहीं लिया सहारा ?
शायद ऐसी उसकी आदत ही नही थी.
गिरते ही लोगों ने काट डाली उसकी शाखें
फिर भी उसने उफ़ तक ना की.
निभाता रहा अपना संकल्प सृजन का.
आज भी जब मैं गुजरता हूँ उसके कटे धड़ के नीचे से
उसके हर एहसास में मुझे मिलता है
सदा उसका त्याग.
हे प्रभु तू तो सर्वशक्तिमान है
दाता है, अंतर्यामी है.
मुझे भी आशीर्वाद दे कि मैं बन सकूँ
उस पेड़ कि संकल्प का उत्तराधिकारी.

शिशिर “मधुकर”

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/10/2015

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