यकिन नहीं आता मुकद्दर पे, कि तुम यू दूर मुझसे जाओगे

यकिन नहीं आता मुकद्दर पे
कि तुम यू दूर मुझसे जाओगे
बीते अपने यादों को
ऐसे तुम बिसराओगे
वो बातो-बातो में तेरा रूठ जाना
रूठे हुए तुझे मनाना
वो शर्म से चेहरे को छिपा लेना
और कनखियों से इशारे करना
वो मस्तियों में चीटी काटना
और गुस्से में गले से लग जाना ,
वो कपोलो का चुम्बन
और केशों में तेरी खो जाना ,
बैठ उपवन में फिर कहीं
तुझको बाँहों में भर लेना
बीते हुए इन पलो को ,
क्या तुम कभी भुला पाओगे
यकिन नहीं आता मुकद्दर पे
कि तुम यू दूर मुझसे जाओगे ….
बेशुध हो जाना खुद से
खोके कभी आगोश में मेरी
ख़ामोशी से भरे सुरों में
प्यार की फिर बातें करना
कसमे खाना साथ वफ़ा की
और संशय को दूर करना
खोयी मेरी आँखों में
फिर देखना कल के हसीन सपने
ख्वाबो से फिर बाहर आना
आँखों को अश्को से लिपटे पाना
क्या फिर उन नम आँखों को
देखे सपने लौटा पाओगे
यकिन नहीं आता मुकद्दर पे
कि तुम यू दूर मुझसे जाओगे ….

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/10/2015

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