कशमकश

सपनो की उन गलियों में ,
न खिल पायी उन कलियों में
आशा के दीप जलाता हूँ ,
बस प्रेम राग ही गाता हूँ ||

उन लम्हों को , उन यादों को ,
जो ना निभ पाए उन वादों को
लिख – लिख कर दुहराता हूँ ,
आशा के दीप जलाता हूँ ,
बस प्रेम राग ही गाता हूँ ||

तेरा दामन जब से छूटा है ,
वो कच्चा धागा टूटा है ;
सबर का सागर छलका है ,
बन आंसू आँखों से ढलका है ;
अब माटी में मिल जाता हूँ
आशा के दीप जलाता हूँ ,
बस प्रेम राग ही गाता हूँ ||

क्या समय लौट कर आएगा ,
अतीत वर्तमान बन जायेगा ;
गलबहियाँ डाल रहे होगे ,
और रात हमें टहलायेगा ;
रोते अरमानों को सहलाता हूँ
आशा के दीप जलाता हूँ ,
बस प्रेम राग ही गाता हूँ ||

कल -कल करती हँसी तुम्हारी ,
निश्छल नैनों की गहराई ;
जब भी हाथ लिया हाथों में ,
तुम लाख – लाख थी शरमाई ;
अब रोज इन्हें दफनाता हूँ
आशा के दीप जलाता हूँ ,
बस प्रेम राग ही गाता हूँ ||

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/10/2015
    • sushil sushil 03/10/2015
  2. masuma 03/10/2015
    • sushil sushil 03/10/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/10/2015
  4. Dharitri Dharitri 22/09/2016

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