यातना ख़ुशी की, चीख़ मुस्कराहट की

.”””””” यातना ख़ुशी की, चीख़ मुस्कराहट की””””””’

उस दिन उस घर में काफी उत्साह का माहौल था.लगता था जैसे खुशियाँ नन्हे -नन्हे क़दमों से मुस्कराहट से बाँझ पड़े उस घर में दस्तक देने वाली थी. सब लोग दर्द मग्न पलकों के टपकते आंसुओ से आने वाली ख़ुशी के कदम धोने को आतुर थे. सभी के मुख पटल पर एक ऐसी मुस्कान बिछी हुई थी ज्यों ठण्ड से ठिठुरते याचक को किसी किनारे एक जलता हुआ दीपक मिल गया हो. यह सब देखकर मेरा भी मन काफी प्रफुल्लित हुआ. उत्सुकता का सैलाब रोके, रुकने को तैयार नहीं था. मानो आज तन -मन उस घर की खुशियों का कारण जानने को बेक़रार थे. तो मैंने भी ज़्यादा विरोध ना करते हुए अपनी इच्छाओ के सामने आत्मसमपर्ण कर दिया, और कदमो के ताल उस घर के सुरीले साज़ों से मिलने को चल पड़े. घर के अहाते में कदम रखते ही मानो आज ख़ुशी लिपटते को तैयार बैठी थी. जो आँखें, जो लोग हमेशा उजड़े उजड़े से रहते थे, जो आँखें मेघ की तरह हमेशा नम रहते थे, आज उन्ही नम आँखों में नमी के साथ एक चमक भी थी. आज हमेशा की तरह उनकी आवाज़ भाव विहीन नहीं थी. चाय-पानी से निवृत होने के मध्याहन में ही मैंने उनकी ख़ुशी के पीछे छुपे मुखड़े से पर्दा हटाने की कोशिश करनी चाही, लेकिन उससे पहले उन्होंने ही अपने मुख से उस मुखड़े का दीदार करा दिया, वो मुखड़ा बड़ा ही प्यारा और वाकई ख़ुशी ज़ाहिर करने योग्य था. क्योकि आज उस घर की इकलौती बहु जो सालों से मन्नतों की डोर से बंधी अपनी गोद भरने की इच्छा रूपी पतंग को अपने ईश तक पहुँचाने के प्रयासों में लगी हुई थी, आज वो आशाएँ पूरी होती लग रही थी, और उस पतंग में अपनी मंज़िल को पाने की ज़ग्दोजहत कामयाब होती दिख रही थी. मैं यह जानकर काफी खुश था और उन लोगो के चेहरे पर बिछी हंसी कहीं ना कहीं मेरे चेहरों से मिलने लगी थी. फिर मैं वहां से विदा लेता हुआ अपने रोज़मर्रा के कार्य पर निकल पड़ा, रास्ते में रोज की तरह वही पुराना मंदिर जिसमे बैठा वो सर्वोपरि ख़ुदा लाखों मन्नतों से सने दूध से नहलाया जाता और एक ईमानदार कर्मचारी की तरह काम पूरा करने से पहले न्यौछावर लेता. ख़ैर ये रोज की बात थी और मैं आगे बढ़ गया. और अपने कार्य स्थान पर पहुंच कर उस ख़ुशी के बारे में सोचने लगा, पता ही नहीं चला कब संध्या हुई और घर जाने का वक़्त हो गया . मैं घर के लिए निकला और ये सोचने लगा की मैं भी तो एक पतंग ही हूँ, जो आसमान रूपी दौलत की आशा में रोज खींचा चला आता हूँ और दिनभर की नाकाम क़ोशिश वापिस चरख़े में खींच लाती है. ख़ैर वापिस आते समय फिर उस घर की तरफ देखा , उम्मीद थी हँसते हुए चेहरे अभी भी खिल खिला रहे होंगे. लेकिन मंज़र कुछ और ही बयाँ कर रहे थे, एक सन्नाटा गूँज रहा था उस घर में, चेहरों पर बिछी हंसी अब किसी कोने में मृत पड़ी हुई थी. ऐसा लग रहा था जैसे आती हुई ख़ुशी दुर्घटना ग्रस्त हो गयी हो और आशाओ ने उसे मृत घोषित कर दिया हो. कदम दौर पड़े उस तरफ ताकि हँसी को बचाया जा सके, लेकिन यह सब व्यर्थ था. सभी के चेहरे दर्द और चीख से लथपथ थे, ऐसा लग रहा था जैसे वह घर दुखों का बरगद हो जिसके नीचे खुशियों के पौधे चरमरा रहे थे. पर अचानक जब कानों में इस गम की वजह का कारण गूँजा तो मेरे अंदर उमड़ते दया भावना को तमाचा सा लगा, ज्यों घ्रीणा ने दया भावना को दबोच लिया और उसे क्षीण-विहीन कर दिया. मेरा व्यक्तित्व मुझपर हंस रहा था, वह अट्टहास कर रहा था की मेरे अंदर जिन लोगो के लिए संवेदनाओ का सैलाब था उससे कहीं बड़ी घिनोनी खाई इन लोगो के मन में थी जो घर में आने वाली “ख़ुशी” को एक “चिराग” की चाहत में जला बैठे थे . मुझे खुद से घिन आ रही थी, की मैं बबूल के काँटों से प्रेम जताने का प्रयत्न कर रहा था| सुबह जो दया इन किस्मत और ख़ुदा के मारे लोगों के लिए थी अब उस किस्मत और ख़ुदा के लिए सांत्वना बन चुकी थी, और साथ ही एक सवाल भी था.
क्यों इस तरह के लोग पानी की तरह “ख़ुशी” की कुलबुलाहट करती बूंदों को मिटाने को आतुर रहते हैं, क्यों ख़ुदा भी कभी इन जैसो को मौका देता है बारिश पाने का | क्या ख़ुदा आहत नहीं होता चिराग की लौ में जलती खुशियों को देख के | गर ख़ुदा बारिश करता है तो एक छाता इन जैसे लोगो पर डाल दें ताकि किसी बूँद को तो कुलबुलाहट करने का मौका मिले ….|
वो दिन ऐसा था जब “ख़ुशी” माँ की गोद में अटखेलियों से परे , माँ की गोद में ही दफ़न कर दी गयी थी ……|
By Roshan Soni —

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  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 28/09/2015