शीर्षक -मेरी नौकरी .

शीर्षक -मेरी नौकरी .
हर सुबह ,
अपनी खोली से निकलता हूँ
सड़के
सड़को पे भीड़ ,
डर लगता है ,
कहीें भीड़ का हिस्सा न बन जाऊं .
दौड़ते मोटरगाड़ियां ,
मोटरगाड़ियों की तेज आवाजे ,
उनके बीच मेरी साँसे ,
मुझे सुनाई भी ना पड़ती है .
जमीं पर चलते ,
मेरे हवाई चप्पल ,
दुःख होता है ,
मेरे कारण घिस रहे है
भीड़ में कंधो के ठोकरे खाकर ,
एहसास होता है की ,
मेरे जैसे और भी है ,
हाथों में एक पुरानी फाइल ,
उसमे मेरे सपने ,
तंग कमीज बदरंग पायजामा पहने ,
सड़को की ख़ाक छानता रहता हूँ ,
tubewel से निकलता गर्म पानी ,
ठंडक पहुँचाता है मेरे दिल में ,
गेटवे ऑफ़ इंडिया से छनती ,
सूर्यमहाराज की किरणे ,
जलती नहीं ,
बल्कि तड़पाती है .
पता नहीं क्यूँ,
“ताज होटल ” को देखते ही ,
जलन होने लगती है .
मेरे कदम वापस ,
लौट पड़ते है,
अँधेरा बढ़ने लगता है ,
चक -चक करती मुंबई ,
मुझ पर मुंह चिढ़ाती है .
मेरे सपने कहीं जल ना जाए ,
उन्हें बाँहो में समेट कर ,
खोली में वापस जाता हूँ ,
पैरो को सिमटकर ,
बैठ जाता हूँ
फिर सोचता हूँ ,
क्या हुआ जो आज ना मिली ,
कभी ना कभी तो ,
मिलकर रहेंगी मुझे ,
मेरी नौकरी .