दम्भ – The ego of a capitalist

थिरक रही अभिमान निहित झनक झंझावत,
सकल दया-मेघ निज शीश्चुम्ब अविरल बरसत;
निज पद विस्तृत भूमि-विरचित मनहु कृपा ,
मोहे ही बस रखे भिगोये, शेष वारि लूं हथचंद्र छिपा |

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भीग जो हों नृत्य अदा जाएं निज गात मचल ,
कृपाजनित प्रभु गंगाजल हस्तकमल में किन्तु अचल ;
पीता जाऊं एकत्रित कर बूँद-बूँद नशे में मद होकर ,
झरता जाऊं नमक-जल डूबें चाहे सर्वजन दु:श्रम सागर |

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कुछपे आशिष दऊँ अतिरेक विखंडित |
कनीं जल झरऊँ दम्भित विचम्भित ||

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दुष्कर्म हमें करना होगा अज्ञानी पर ,
सद्धर्म कठिन चलना पीड़ा अनजानी कर ;
पूत तुम्हारे किंचित् बेध्यानी कर ,
छोड़ रखा वाचाल कृपा मरु-तप्ताणी पर |

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मन उदास न चंचल गाछ |
ढूंढे कोई मिल के चरण नाथ ||

जय श्री राम !

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