बिन प्रेमी यह यौवन कैसा , कुमुदनी को तरस रहे भंवर के जैसा

बिन प्रेमी यह यौवन कैसा
कुमुदनी को तरस रहे भंवर के जैसा
ना बिंदिया माथे पे भायेगी
ना आँखों में सपने आयेंगे
सुन्दर लाल कपोलो पे फिर
विरह के आंसू छा जायेंगे ,
रक्त-रंजीत सी अधरों पे
मुस्कान बिखर ना पाएंगे
जीवन नीरस पड़ जायेगा
सावन को व्याकुल चातक के जैसा
बिन प्रेमी यह यौवन कैसा …….
अधखुले मचलते केशो में
कर्णो में पड़े कुण्डलो में
नाम तुम्हारा ही होगा
जीवन के अंतिम श्वासों में
मोल ना कोई इस यौवन के
तुम बिन फिर एहसास ये कैसा
लगता है फिर कुछ जीवन ऐसा
चैत्र में गिरी वर्षा के जैसा
बिन प्रेमी यह यौवन कैसा ……
चन्द्र सी आभा वाले मुख पे
यौवन को दर्शाते तन पे
करती है अटूट प्रहार
मेहंदी से युक्त कोमल करों पे
अजीब सी लहर दौड़ जाती है
बिखरे इस अंतर्मन में
व्याकुलता फिर भर आती है रोमो में
तन में समायी अदृश्य वायु के जैसा
बिन प्रेमी यह यौवन कैसा …….
सपने गुलजार ना होते कभी
हिय लगता है खाली-खाली सा
हो बेसुध स्वयं से खो बैठी हु
बन पाषाण की मूरत सी
लाक्षारस से युक्त कदमो पे
लगता बोझ पड़ा हो भारी सा
तुम बिन फिर ये जीवन कैसा
डाली से टूटी टहनी के जैसा
बिन प्रेमी यह यौवन कैसा ……

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/09/2015
    • omendra.shukla omendra.shukla 26/09/2015

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