होके बेशुध अपने कर्मो से अश्रु बहाने वो चला है

होके बेशुध अपने कर्मो से
अश्रु बहाने वो चला है
निज मान मर्यादा का त्याग कर
सम्मान बचाने वो चला है
इतिहास के गुजरे पन्नो में
इंसाफ खोजने आज निकला है
परित्यक्त तमस युक्त जीवन को
दिया उम्मीद का जलाने वो चला है
होके बेशुध अपने कर्मो से ……
ख़ामोशी में उलझे शब्दों को
सुरों में पिरोने आज निकला है
अनकहे अल्फाजो का निज
भाव समझने वो चला है
महफ़िल में डूबी तन्हाई को
फिर से सजाने आज चला है
प्रेम पथ पर अग्रसर ,
होने को वो बेताब चला है
होके बेशुध अपने कर्मो से ……

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