बदल गए है पैमाने जीवन के

बदल गए है पैमाने जीवन के
पर सोच अभी ना बदली है
घुट-घुट के जीने को आज
मजबूर दामिनी कहीं जली है,
यौतुक रूपी उस दानव ने
फिर से पाव पसारा है
नहीं मिटी है क्षुधा किसी की
ना इससे किसी को गंवारा है
मानवता दफ़न हुई अन्धविश्वासो में
जानता जग ये सारा है |
पहल करेगा कौन यहाँ
तोड़ने को आज फिर इन रस्मो को
झूठे आडम्बरों में धु-धु जलती
जीवन के सभी कसमों को
तरस के रह जाती है बूढी आँखे
सुनने प्यार के अल्फाजो को ,
जीवन गए फिर अश्रु बहाये
ना लौटा देगा ये उन पलों को
तरस गया रोटी के एक कतरे को
उम्मीद लगाये जीवन कोई
फिर खोवे के पिंड में कभी
क्या शांति नजर आएगी कोई
मंदिर-मस्जिद की सीढ़ियों पे
दम तोड़ गया क्षुधा से कोई
नजरअंदाज करके रहनुमायियों से उनको
क्या श्रद्धा सफल हो पायेगी कोई
बहता है दूध का शैलाब पत्थरों पे
और कोई बचपन कहीं इसके लिए रोता है
चढ़ जाती है मस्जिद में चादर बेशुमार कहीं
मगर सर्दी से कोई फकीर वहीँ दम तोड़ता है ….

2 Comments

  1. आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 25/09/2015
    • omendra.shukla omendra.shukla 25/09/2015

Leave a Reply