गिरह फिर खोल दो…

गिरह फिर खोल दो साक़ी, जो अब घुटने लगा है दम ।
निगाहों से पिला दो मय, कि प्यासे मर न जाएँ हम ।।

आशियाँ है ये छोटा सा, कुछ शिकवे-ओ-शिकायत हैं ।
यूं दिल में शक़ न पैदा कर, कि वापस घर न आएं हम ।।

यहां हर शख़्स की नियत पे, पानी फिर चुका या रब ।
पकड़ कर मुझको रख ऐ रब, नज़र से गिर न जाएँ हम ।।

बे ईमां दुनिया में हरसू, है इतनी वादा खिलाफ़ी क्यूँ ।
ज़बां ऐसी तू दे मुझको, ज़बां से फिर ना जाएं हम ।।

— अमिताभ ‘आलेख’

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 24/09/2015

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