तेरी आँखों में…

तेरी आँखों में वो अफ़साना पढ़ने लगा हूँ मैं।
तेरे दिल की धड़कनों को भी समझनें लगा हूँ मैं।।

क्यूँ कर नही पाते हो तुम दिल-ए-इज़हार।
ये राज़ भी थोड़ा थोड़ा समझनें लगा हूँ मैं।।

दिल-ए-आरज़ू मेरी ज़रा तू भी तो समझे।
तेरा हाल-ए-दिल अब समझनें लगा हूँ मैं।।

आँखों में तेरी मैंने कई बार पहले झाँका।
अब गहराइयों को उनकी समझनें लगा हूँ मैं।।

जब तक न तुम मिले थे था मैं महफ़िलों की शान।
अब तन्हाइयों को भी समझनें लगा हूँ मैं।।

संभाले नही संभलते अब ये दिल-ए-जज़्बात।
दिल-ए-बेचैनियों की फ़ितरत समझनें लगा हूँ मैं।।

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 24/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 24/09/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 24/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 24/09/2015