आईने में मुझे मेरी सूरत…

आईने में मुझे मेरी सूरत नही मिली
जो मिली वो किसी खौफ से सहमी हुई मिली।।

दिन के उजालों को जब रात ने आ घेरा
गुलशन की हर कली मुझे सहमी हुई मिलीं।।

गैर मुल्क वो गया है छोड़कर अपना वतन
दूध की नदियां वहां पे बहती हुई मिलीं।।

घर वो पहुंचा जब शहर-ए-फ़ित्ना के बाद
वक़्त की हर साँस उसे ठहरी हुई मिलीं।।

[ फ़ित्ना = विद्रोह, दंगा ]

— अमिताभ ‘आलेख’

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 23/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 23/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 23/09/2015
  3. Rajdeep_143 23/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 23/09/2015
  4. omendra.shukla omendra.shukla 24/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 24/09/2015

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