रोटी को तरसते आज यौवन देखा है , शिक्षा को फिर मांगते भिक्षा देखा है |

देखके बदहाल व्यवस्था शिक्षा की
मन फिर कुछ सकुचाता है
खुद से अधिक थैलो का भार
बचपन आज का उठाता है
शिक्षा में बढ़ते नए आयामों को
देख दिल पसीज सा जाता है
यह शिक्षा है या कोई व्यापर
समझ में न कुछ आता है
भेद बदल गया गुरु-शिष्यों का
औपचारिकता मात्र बची है आज
शिक्षक खुद का दिन है भरता
ध्यान सारा क्लासेज को देता है
शिक्षा विद्यालयों में रही ना अब
कह ऐसा खुद के कर्मो से विमुख होता है
क्लासेज में यदि तुम आओगे
नंबर इम्तिहान में अच्छे पाओगे
नंबर का बहाना करके
खुद की जेब गरम करता है
पुराणो,उपनिषदों का नाम ना कोई
शिक्षा में आज यहाँ लेता है
यौन शिक्षा जरुरी है आज ,
हर कोई तंज यहाँ कसता है
क्या संस्कृतियों से दूर कोई,
मानव जीवन कहीं बसा है
या फिर पाश्चात्य में जाने को
हमने किया नशा है,
आज बहुत शिक्षा ली है हमने ,
पर क्या न्यूटन कहीं बना है कोई
बहुत ज्ञान हासिल किये है हमने
पर क्या फिर कौटिल्य बना है कोई
शिक्षा कहीं दफ़न हो गयी है आज ,
आधुनिक आडम्बरों के दलदल में
डिग्रीयां धरी पड़ी मिलती है यहाँ
घर के कूड़ेदानों में ,
क्या मोल है ऐसी शिक्षा का
सोचे जरा कोई एक पल को
रोटी को तरसते आज यौवन देखा है ,
शिक्षा को फिर मांगते भिक्षा देखा है |

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/09/2015
    • omendra.shukla omendra.shukla 23/09/2015
      • omendra.shukla omendra.shukla 23/09/2015
  2. Amitu Sharma 23/09/2015
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 24/09/2015

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