लौटा दे पुनः कोई मेरा वो बचपन

वो भी कितने हसीन दिन थे
जब रुपये एक में सपने मिलते थे
होते थे सपनो के नवाब कभी हम
दुनिया मुठ्ठी में अपने हम रखते थे
कागज के ही बने सही हो ,
पर पानिमे जहाज अपने भी चलते थे
दूर कहीं आसमानो में फिर ,
जहाज सपनो के अपने उड़ते थे
वो भी कितने हसीन दिन थे ….
ना हार पे अपने हम रोते थे
ना जीत में कोई उमंग रखते थे
रेत पे सपनो के महलों को
जीवन प्रदान नया करते थे
किताबों में रख मोर के पंख
विद्या आने के सपने लखते थे
निस्वार्थ भाव से मित्रो की अपने
मदद स्वयं किया करते थे
वो भी कितने हसीन दिन थे …
लौटा दे पुनः कोई मेरा वो बचपन
दादी के किस्सों वाला ,
माँ की गोंड में खेलता जीवन ,
निश्छल,कोमल मन वाला ,
बचपन है जीवन का अनमोल रतन
ऐसा लोग यहाँ कहते है …

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/09/2015

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