लखनऊ…

लखनऊ से अब आपको मिलवाऊँ क्या जनाब।
ये शहर है किस्सों और तहज़ीब का जनाब।।

इस शहर में मिलेंगे जहां ज़ायके तमाम,
ठंडी लस्सी टुण्ड कबाबी और पान में किमाम।
हर शख्स का यहाँ है अपना अलग मिज़ाज,
मंदिर की आरती भी है और मस्जिद की है नमाज़।।

ऐतिहासिक धरोहरें भी यहां रहती हैं बेशुमार,
रूमी दरवाज़ा इमाम बाड़ा औ बागों की है बहार।
नवाबों का शहर है ये यहां हर शख्स है नवाब,
इस शहर का कुछ जुदा ही अंदाज़ है जनाब।।

अब आपको सुनाऊँ मैं इसकी जुबां की शान,
ग़ज़ल-ओ-शायरी की ज़मीं है मीर ग़ालिब का है मकान।
इस शहर में मिलेंगे तुम्हे आशिक़ भी बेहिसाब,
ज़रा तहज़ीब से शहर में पेश आईएगा जनाब।।

— अमिताभ ‘आलेख’

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 22/09/2015

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