वो छुपा सके न…

वो छुपा सके न वो राज़-ए-दिल जो एक उम्र पहले गुज़र गया।
वो जो हम में तुम में करार था वो करार जाने किधर गया।।

मेरी ज़िंदगी का वो रहनुमा फ़ितरत भी उसकी यही रही।
वो चमक रहा था हर एक सिम्त अब टूटकर के बिखर गया।।

कहता था मुझसे वो कभी मंज़िल तो मेरी तू ही है।
कभी हौसले से बढ़ा था जो क्यूँ बीच राह फिसल गया।।

दुनिया की आज़माइशों से मिला उसे है वो हौसला।
वो नहा के कैसे धूप में किस तरह देखो निखर गया।।

एक वक़्त था वो करीब था वो मेरा दिल-ए-सुकून था।
अब वक़्त की भी खबर नही वो कहाँ गया किधर गया।।

— अमिताभ ‘आलेख’

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 22/09/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/09/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 22/09/2015

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