अन्धेरा कोना

मेरे घर के एक कोने में
अन्धेरा रहता है ।
दीप जलाता हूं -ताकि
अन्धेरे को ना देखूं,
पर आंखें लौ से ऊपर,
धूंये पर टिक जाती हैं ।
देखता हूं -‘लौ तम मिटाते मिटाते
तम बन कर रह जाती है ‘!
लौ से उठते- अनन्य स्याह घेरों में
हर किरण सिमट सिमट
दम तोड़ जाती है ।
स्याही के ये घेरे भी
बिखर बिखर शून्य हो जाते हैं ।
लौ ढूंढने को
पलकें झुकाता हूं–
क्या पाता हूं -दीप सूख चुका है
और लौ अदृश्य है-
शेष रह गया है-
फिर वही कोना –
अन्धेरा कोना ।
इस कोने के अन्धेरे में –
इतना अपनापन पाता हूं
कि भूले से दृष्टि लौ पर पडे़
तो डर जाता हूं ।

—— विमल
(बिमला ढिल्लन)

6 Comments

  1. संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 22/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 22/09/2015
  3. bimladhillon 22/09/2015
  4. bimladhillon 22/09/2015
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/09/2015
  6. bimladhillon 22/09/2015

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