शब्दो का खेल

हर लफ्ज का एक अलग फ़साना होता हैं
अच्छे वक्ता के पीछे सारा जमाना होता हैं
शब्द हमारे सोच को प्रकट करने का जरिया हैं
इसी से किसी की शान है तो इसी से कोई बदनाम है

होंठ खुलते हैं और दिल के सोच बयाँ हो जाते हैं।
पर कुछ बातों को छुपा जाना हमारा फितरत होता हैं।
हम बोल जाते हैं बहुत कुछ कुछ ना बोलकर भी
खोमोशी में भी कभी कभी इतना ताकत होता हैं।

जमाना आपको आपसे नहीं आपके सोच से जानता हैं।
आपके चेहरे को नहीं आपकी सख्शियत को पहचानता हैं।
कहते हैं हरेक लफ्ज हम ह्रदय – तराजू में तोलकर
लफ्ज ही तो हमारे वयक्तित्व का आईना होता हैं

झांकते हैं बुराई को दूसरों में पर झाकते नहीं कभी अपने अंदर
पर जो आग में तपकर निकले वही तो खरा सोना होता हैं
रख देते हैं ताक में रिश्तों को भी तरक्की के ख़्वाहिश में
दिल अपनों का दुःखा कर कुछ पाना भी कोई पाना होता हैं

देखें हैं हमने अनेक मंजर अपने भी कभी घोप देते हैं खंजर
रिश्तें कुर्बान होते देखा हैं इन्शानियत शर्मसार होते देखा हैं
सत्ता के ख़्वाहिश में जयचंदों को गद्दार होते देखा हैं
अपनों का दामन छोड़ कर दोस्त को दुश्मन बनते देखा हैं

हम कहते हैं दोस्त उसे जो करता हैं हमारी तारीफ़
तो क्या हर बुराई करने वाला हमारा दुश्मन होता हैं
पैसें और रुतबें का एहसास आवाज में नजर आता हैं
अमीरी में अक्सर आदमी का ख़्यालात बदल जाता हैं

शब्दो मे एक अलग सी वेग होती है जो चाकू से भी तेज होती है
कभी तो ये दिल में उतर जाती है तो कभी ये दिल को कुतर देती हैं
आपकी आवाज ही आपकी पहचान है इसको सोच समझ कर उपयोग करें
सदा सत्य और शांति का वरन करें वसुधैव कुटुम्बकम का अनुसरण करें।

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/09/2015
    • नन्द्किशोर नन्द्किशोर 21/09/2015

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