इच्छाएं

दुनिआ खेल खिलौना है
खेल समझ कर खेलो इसको
नहीं तो कांटे. बोना है
इच्छाओं का कोई अंत नहीं
फिर खुद को ही भरमाना है
कैसी कैसी इच्छाओं के
महल रोज़ बनाते हैं
उनको न पाने पर
जी भर आंसू बहाते हैं
वश में इनके होना मत
ये पंख लगा उड़ जाती हैं
मन को बांवरा करती हैं
और चैन दिलों का हरतीं हैं
जब इक होती है पूरी
दूजी पंख फैलती है
पकड़ है इनकी बड़ी हठीली
गांठें इनकी बड़ी गठीली
मोह माया से इनका नाता
घना और पुरना है
जादू इनका बड़ा निराला
कोई न इनसे बचनेवाला
ये सबका शीश झुकाती हैं
और सबको नाच नाचती हैं
इनके माया जाल से हमने
खुद को ही बचाना है
इच्छाओं का कोई अंत नहीं
खुद को ही समझाना है

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 22/09/2015

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