* तिलक और दहेज *

पहले तिलक था
अब दहेज हो गया ,
पहले सौख था
अब कलेश हो गया ,

पहले स्वेच्छा से देते थे
अब मज़बूरी हो गया ,
शादी-ब्याह का
अब यह धुरी हो गया ,

पहले प्रेम सेवा भाव था
अब इसके लिए सताते हैं
वधु को जलाते हैं
अपनी कीमत खुद लगाते हैं ,

पहले आदशर्वादी थे
अब भौतिक वादी हो गए ,
पहले इस पर न कोई
जोड़ था न कोई गौर था ,

अब इस पर धरा
कानून और करा बन गया
झूठे मुक़दमे में फसाने का
सहारा बन गया ,

न्यालय में मुकदमों का अम्बार लग गया
फिर भी न शासक न प्रशासक
न जनता न भक्त भोगी
सोचने को न हैं तैयार
कब सुधरेगी यह समाज
शांति से जी सके किसी का बाप।

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया DK Nivatiya 21/09/2015
    • नरेन्द्र कुमार नरेन्द्र कुमार 21/09/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 22/09/2015
  3. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 22/09/2015
    • नरेन्द्र कुमार Narendra kumar 22/09/2015

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