MUKTAK-2

……………….MUKTAK…………….

(1) नज़्म नज़र कुछ कहती है, साँसें खण्डर हो ढहतीं हैं |

घुटते तन में क्यों पिंजर बंद, यादें तेरी बस रहती हैं ||

(2) नज़राना नाराज़ी का, अल्फ़ाज़ नहीं कोई राज़ी सा ।

छूटा अम्बर पंखों से मेरे, सपना टूटा परवाज़ी का ।।

(3) ज़ख्म दबा कोई आँखों में, सिफ़र है धड़कन साँसों में |

उसको रानी का ताज नवाज़न, मैं जोकर बन बैठा ताशों में ||

(4) शब में साया दिखता ही नहीं, खुद से ये तन मिटता ही नहीं |
मय में जो देखू अक्श कभी, “मैं” से तो “तू” हटता ही नहीं ||
By Roshan Soni

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 19/09/2015
    • roshan soni roshan soni 22/09/2015

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