ख़ाली हाथ ही जाना है

ज़िन्दगी ने जो दिखाया
हमने खुद को बताया
चाहा कभी रोक लें पलों को
उनसे कभी पीछा भी छुड़ाया
सुख दुःख तो हैं सायों की तरह
निभाते हैं साथ अपनों की तरह
हो सकती है जुदा कहानी तेरी मेरी
कभी उजला सवेरा कभी रात अँधेरी
हम उलझे हैं भूलभुलय्यों में
है ज़ोर कहाँ अब कलइय्यो में
शाम ज़िन्दगी की होने को है
वादे इरादे सब खोने को हैं
बुन लिए बड़े जाल सुनहरे
देते रहे सदा उनपे पहरे
अब छोड़ यहीं सब जाना है
ख़ाली हाथ आये थे
ख़ाली हाथ ही जाना है
उम्मीदों से नाता तोड़ लिया
गुज़रे वक़्त को भी छोड़ दिया
अब क्या खोना है क्या पाना है
इन बातों सेअब क्या घबराना है
ख़ाली हाथ आये थे
ख़ाली हाथ चले जाना है

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 19/09/2015
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 19/09/2015

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