सफर जिंदगी का आज कुछ थम सा गया है

सफर जिंदगी का आज कुछ थम सा गया है
दौर गुजरे पलो का फिर से लौट आया है |
ना आज इम्तिहान है कोई ,
ना ही किसी का इन्तेजार है |
अधूरी जिंदगी पड़ी है यहाँ
या फिर सितम की मार है |
ना अब ख्वाहिशे कोई है,
ना हसरतो का मेला है |
राह में चलने को आज ,
मुसाफिर पड़ा अकेला है |
ना मंजिले है खोई ,
ना रासते नए है |
बूढ़े हुए सपनोे पे ,
छज्जर नए पड़े है |
सपनो को पूरा करने में,
अधूरे अपने ही सपने रह गए|
होक शामिल सोहरतो में उनके
हम मुकद्दर से दूर रह गए |
तालीम की बंदिशों में बन्ध के
इश्क़ को खुद बनाना चाहा ,
फरामोशी के चेहरों में हमने
एक नूर तलाशना चाहा |

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/09/2015
    • omendra.shukla omendra.shukla 18/09/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/09/2015

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