एक गज़ल- इंसान की यहाँ

ज़िन्दगी ऐसी हो गई है इंसान की यहाँ |
जरुरत ही नहीं लगती श्मशान की यहाँ ||

नुमाइशों के लिये हैं ये मंदिर – मस्जिद ,
मन में नहीं है मूरत भगवान की यहाँ |

आपस में ही लड़ते हैं परिवार के सभी ,
जरुरत ही नहीं पड़ती अन्जान की यहाँ |

जिसे ये पालकर भेजता है कत्लखानों में
चीखें सुनेगा कौन उस बेजुबान की यहाँ |

ज़िन्दगी ऐसी हो गई है इंसान की यहाँ |
जरुरत ही नहीं लगती श्मशान की यहाँ ||

-padam shree

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/09/2015
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 17/09/2015

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