उलझन

न जाने कितने प्र्शन लिए
मैं तेरे चरणों में आयी
उलझे मन को सुलझाने में
न तू ने देर लगाई.
लगा मुझे तू सब सुनता है
फिर भी मैं घबराऊँ
देखूं तेरे नैनों में
तो असमंजस में पड़ जाऊँ
बिना कहे सबकह देता है
धीरज मन को दे देता है
अब और कहाँ. मैं जाऊं
कैसा बांधा तूने कान्हा
चैन, तेरे चरणो में ही पाऊँ
छीन लिया है हक़्क़ दुनिआ से
की अब वोह मुझे सताए
जिसके पास है साया तेरा
भला फिर वोह क्यूं घबराये
धुन बंसी की. मधुर मधुर
यह कैसा. राग सुनाये
सतरंगी दुनिआ का मानों
हर रंग फीका पड़ जाये
सदा पास बने रहना तुम
श्वास श्वास में बसे रहना तुम
जब प्राण पंखेरू उड़ जाएँ
तब भी साथ बने रहना तुम

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/09/2015
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/09/2015

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