“दिखावे की रस्म” …… ( पारिवारिक कहानी )


{{ दिखावे की रस्म }}

आज घर में बड़ी चहल पहल थी I और हो भी क्यों न ! घर में मेहमान जो आने वाले थे, वो भी घर की बड़ी बेटी “तनु” को शादी के लिए दिखावे की रस्म अदायगी के लिए I साधारण परिवार में जन्मी तीन बच्चो में सबसे बड़ी बेटी, एक कमरे का मकान जिसमे एक छोटा सा आँगन, पिता एक सामान्य सी नौकरी कर के घर का खर्च चलाते थे I

घर का माहोल खुशनुमा बना हुआ था I सब के मुख पर ताजगी देखते ही बनती थी I मम्मी खुश मगर सकुचाई जी नजर आती थी, पिता के चेहरे पर ख़ुशी के मध्य में चिंता के भाव साफ़ नजर आते थे, उन सब के बीच काम बोलने और अपने संसाकरो के प्रति सजग “तनु” के मन में रह रहकर हजारो सवाल उठ रहे थे I कुछ सूझ नही रहा था, मन बड़ा ही विचलित था ! तभी किसी ने बाहर से आकर खबर दी …मेहमान आ गए है ! छोटे से मकान में चहल कदमी बढ़ सब इधर उधर दौड़ने औए व्यवस्था को सवारने में व्यस्त हो गए …जैसे ही मेहमानो ने घर के अंदर प्रवेश किया उनका जोरदार स्वागत किया गया ! ….. और बातचीत की रस्म अदायगी होने लगी I

कमरे के अंदर बैठी वो साधारण कन्या अभी भी खुद के सवालो में उलझी थी, मम्मी उसको समझा रही थी की मेहमानो के सामने कैसे व्यवहार करना चाहिए जो जन्म से ही सीखती आ रही थी, मगर आज उससे मम्मी ने क्या क्या कहा उसे कुछ मालूम नही था, वो तो खुद में ही उलझी थी…. अचानक दरवाजे से आवाज सुनाई दी …..बेटी तनु….!…. हाँ, पापा ! सकुचाते हुए अचानक जबाब दिया ! तुम तैयार तो हो ना बेटी ! जी पापा …..धीरे से बोली I पापा पास आकर बोले देखो बेटी … वो लोग आ गए है ! तुम्हे देखने और पसंद करने के लिए …!!

मैंने अपनी तरफ से अच्छा धनी परिवार चुना है I लड़का सुशिक्षित और समझदार है I तेरा जीवन सदा खुशियो से भरा हो … इससे ज्यादा और हमे क्या चाहिए I बाकि आखिरी फैसला अब तुम पर है, जिसमे मेरा तुझे पूर्णतया समर्थन होगा .. कहते हुए पिता ने बेटी के सर पर दुलार से भरा हाथ फेरा ….!!

पिता जी क्या मै कुछ पूछ सकती हूँ ? – सहसा तनु बोल पड़ी !

हाँ …. हाँ बेटा पूछो …सरल भाव से पिता ने जबाब दिया !

क्या धनवान लोग ही सुखी रह सकते है ! हम जैसे साधारण लोग सुखी जीवन नही जी सकते ! क्या धन दौलत का नाम ही ख़ुशी है…….?

पिता चुपचाप थे ! आज पहली बार बेटी ने उनसे खुलकर बात की थी .. वो अपनी बात कहते हुए बोलती जा रही थी !

ये देख दिखावे की रस्म का क्या अर्थ है ! क्या क्षण भर किसी को देख लेने से हम किसी के व्यक्तित्व को जान सकते है ? …… मेरे कहने का तातपर्य यह नही की मुझे इन लोगो या से या पैसे वालो से शिकायत हैं मै तो बस यह कहना चाहती हूँ की मेरी ख़ुशी धन दौलत में नही …उन संस्कारो में है जो आजतक आप मुझे सिखाते आये हो ! मैंने अप ही से जाना हैं की व्यक्ति से ज्यादा अहम उसका व्यक्तित्व होता हैं I अगर दो व्यक्तियों के विचारो में समानता हो तो इंसान हरहाल में खुस रह सकता है I वरना अच्छा भला जीवन भी नरक की भेँट चढ़ जाता है I

पिता चुचाप उसकी बाते सुन रहे थे I बातो में सच्चाई थी i और हकीकत में जीवन का मूलमंत्र भी थी I

बेटी धारा प्रवाह बोलती जा रही थी मानो उसके अंदर का सैलाब आज फुट पड़ा हो, और वो उसमे शब्दों के माध्यम से कतरा कतरा बह रही थी I

क्या दिखावे की रस्म का इतना बड़ा स्वांग रचकर ही हम एक दूजे के बारे में जान सकते है ! क्या इस तरह ही किसी के व्यक्तित्व, आचरण या जीवन शैली का आभास कर सकती हूँ ! मुझे स्वयं को लगता है – शायद नही !

आप यह न समझना की मेरे कहने का अर्थ इन सब का विरोध करना है, मै किसी भी सामाजिक क्रिया कलाप के विरोध में नही, और न ही मै प्रेम विवाह या, लिव-इन-रिलेशन में विश्वाश रखती हूँ ! मेरे कहने का आशय मात्र इतना है की किसी भी व्यवस्था को बदलने की नही उसमे यथास्तिथि समयानुसार परिवर्तन की आवश्यकता है I

जीवन कैसे जिया जाता है ये आपने मुझे अच्छे से सिखाया है, मै हर हाल में स्वंय को ढाल सकती हूँ I परिस्तिथि सम हो या विषम दोनों से निपटना आपने अच्छे से सिखाया है I इतना कहते हुए तनु रुंधे गले से अपने पिता से लिपट गयी, ….दोनों की आँखों में आंसुओ का सैलाब उमड़ पड़ा था I मम्मी मुखड़े पर हाथ रखे अपने स्वर को दबाये खड़ी थी, वो खुद को सँभालने में असहाय लग रही थी I पिता ने रुआंसा होकर अपने दोनों हाथो से बेटी का मुखड़ा ऐसे उठा लिया जैसे बड़ी बड़ी पत्तियों के मध्य पुष्प कमल खिला हो !

बेटी के माथे को चूमते हुए बोले …. बेटा आज मै कुछ नही कहूँगा !

फैसला तुझ पर छोड़ता हूँ ! तेरी सहमति में हमारी सहमति है !

आँगन में बैठे मेहमान और परिवारगण शांत भाव से कान लगाकर उनकी बाते सुन रहे थे ! इतने में अचानक लड़का खड़ा होकर बोला ! …. माफ़ कीजियेगा …. क्या मै कुछ बोल सकता हूँ ? इतना सुनकर सब सहम से गए … बेटी के पिता आवाज सुनकर बहार आ गए और बोले … हाँ बेटा ….क्यों नही … कहिये ! आप क्या कहना चाहते है ?

पिता जी… मुझे लड़की बिना देखे ही पसंद है ! अगर मै शादी करूँगा तो सिर्फ “तनु” से यदि वो अपनी सहमति प्रदान करेगी तब … वरना मै आजीवन कुँवारा रहने की शपथ उठाता हूँ !! यह मेरा निजी फैसला हैं और मै समझता हूँ की इससे किसी को कोई आपत्ति नही होगी… यानि मेरे परिवार को भी मुझे इतनी आजादी देनी होगी !

लड़के का निर्भीक फैसला सुनकर सब अचंभित और अवाक थे I उसके माता पिता भी उसकी और ताकते रह गए I किसी के भी तरकश में जैसे कोई शब्द बाण बचा ही नही था !

लड़के ने आगे बोला, मुझे जो देखना था वो देख लिया ..! मुझे धन दौलत या शारीरिक सुंदरता नही आत्मीय सुंदरता की आवश्यकता है, धन दौलत से तो मै बचपन से ही खेला हूँ, मगर जो सम्पत्ति आज मुझे तुन के विचारो से प्राप्त हुई है उस से मुझे आशा ही नही विश्वास हो उठा है की “एक तुम बदले – एक मै बदला” इसका मतलब “हम बदल गए” और जब “हम बदले तो जग बदले” या न बदले कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ी को तो बदल ही सकते हैं I उसकी ये बाते सुनकर माहोल में हल्कापन आ गया !

अंदर ही अंदर कमरे में दीवार के सहारे खड़ी तनु भी ये सब सुनकर रोते-रोते मुस्कुरा रही थी ! और बहार का शांत माहोल फिर से खुशियो की रफ़्तार पकड़ चुका था !!

!! इतिश्री !!

[[ डी. के. निवातियाँ ]]