रिश्ता

भर आए बादलों का दिल से कैसा रिश्ता है?
बूँदों का ये जमघट क्यूं इस दिल में रिसता है?
फिर हरी यादों से लम्हों की महक आती है
गीली हथेली में गीली हथेली दहक जाती है
कंधे पर वो सर रखना, एक छाते के बहाने से
खुलती उलझती लटे, मोतियों में नहाने से
हवा ने रूख क्या बदला, बूँदों ने तरसा दिया
सूखते सूखते ज़ख़्मों ने, जाने कितना अर्सा लिया
यादों के पंछी सिकुडकर तार पर जम गए
भर आए फिर बादल, पर पिघल क्यूं हम गए?

– अमोल गिरीश बक्षी

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया DK Nivatiyan 16/09/2015
    • amolbol amolbol 16/09/2015

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