मोह

मोह के बंधन बड़े निराले
मूर्ख हैं हम फँसनेवाले
ज्ञान इसका तुम दे सकते हो
राह सीधी पर ल सकते हो
कर दिया खुद को तेरे हवाले
अब छोड़ दे हमें यां बचाले
शरण में तेरी आयी जबसे
प्यार मिला झोली भर भर के
मुक्ति का कोई मार्ग दिखादो
आवन जावन का खेल मिटादो
दिया जीवन में तूने भर भर के
फिर भी लागे गागर सरके
और और का दीवानापन
है अंत कोई यां पागलपन
पाने की इक होड् लगी है
ज़िन्दगी भी भर जोर लगी है
समझें न हम बात ज़रा सी
बीते हर पल जैसे खला सी
नासमझी नहीं है तो और है क्या
इन बातों का कोई ठौर है क्या
सब छोड़ के इक दिन जाना है
फिर खुद को कियूं भरमाना है
जीवन जिओ ऐसे क़ि जैसे
इक फ़र्ज़ है जिसे निभाना है
आने का क़र्ज़ चुकाना है

7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/09/2015
      • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/09/2015
  3. डी. के. निवातिया DK Nivatiyan 16/09/2015
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 16/09/2015

Leave a Reply