क्या कहें – ३

क्या कहें – ३

काश मैं भी समुन्दर के उस सीप की तरह होता
जो तेरी आह से महरूम हर अश्क़ को मोती बना लेता !!

यूँ तो भीगा हुआ हूँ न जाने कब से इस कदर
फिर भी जलता है रोम रोम तेरी यादो से लिपटकर !!

कभी तेरी पैरो की मिटटी को छूता हूँ उस साहिल पर जाकर
कभी खुद को तराशता हूँ उन चट्टानों से टकराकर !!

क्या कहुँ सच्ची तौफ़ीक़ इतनी है तेरे तस्सवुर में
कि अब न टूटता हूँ इस गम ए आईने में
न जार जार होता हूँ उन खुश्क हवाओं में !!!

……………………..शिशु ……………………………

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