ग़ज़ल-

सरकारी सामान का इस्तेमाल तो आम हैI
गाड़ी हो या फोन मानो उन के ही तो नाम हैII

मानव की फ़ितरत से ही तो पर्वत भी हैं ढह रहे ,
भगवान के नाम तो झूठा यूं ही इल्जाम है I

हैं सीखते इश्क से भी हम जीने का फलसफा ,
इसमें यूँ ही मरने वाले करते तो बदनाम हैं I

जनता की तो मुश्किलों का वो नेता हल क्या करे ,
जिनका तो बस टांग औरों की खींचना काम है I

जनतंत्र भ्रष्ट अब जड़ों तक तो इस कदर हो चुका ,
बेचारा मुफलिस कोई तो फाइल से गुमनाम है I

वादों को ढोता रहा यूँ ही पर न था यह पता ,
जो अहल-ए-दिल की सदा का बस गम ही अंजाम है I

‘कंवर’ समझते नहीं हैं, भगवान क्या दीं है क्या ?
इंसान को बाँट दे वो अल्लाह ना राम है I

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/09/2015
    • कंवर करतार 'खंदेह्ड़वी' 16/09/2015
  2. डी. के. निवातिया DK Nivatiyan 16/09/2015
    • कंवर करतार 'खंदेह्ड़वी' 16/09/2015

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