ना जाने कब वो सवेरा होगा

जिन्दगी क सफर न जाने कितना अब बाकी रह गया,
फिर भी ये इंसान स्वार्थ की आँधी मे बहता चला गया ।
खो दिया वजूद इन्सनियत का और खुद को खुदा समझ बैठा।
न ये पता कि वक्त बचा कितना है अब इस जिन्दगी के खजाने में
फिर भी सितम वो औरों की जिन्दगी में ढाता चला गया ।
ना किसी ईश्वर ने कोई नफरत सिखाई,न खुदा ने कोई दीवार बनाई
फिर ये इंसान खुद ही समाज मे खुदा बन बैठा।
न रहा वो सिकन्दर महान न हिटलर का कोई नामोनिशान ,
पर फिर भी कुछ सीख ना सका ये इंसान ।
ना जाने कब ये दीवारें गिरेंगी मजहबों की
ना जाने कब ये खून बहना बंद होगा सरहदों पर
ना जाने कब वो सवेरा होगा इस धरा पर
जो लि जायेगा इस अंधकार को धरा से।
जिसने खींच दी लकीरें इस धरा पर
जिसने बाँट दिया हमे मजहबों के नाम पर
ना जाने कब वो सवेरा होगा
जो सिखायेगा इंसान को इन्सानियत का मतलब
जो सिखयेगा प्यार मोहोब्बत का मतलब ।
ना जाने कब वो सवेरा होगा ।।

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