मेरा दीपक अकेला

इस दिवाली में ,
अमावस्या की अँधेरी रात में,
जलता रहा ,
मेरा दीपक अकेला
सुबह होने तक ,
उस चौखट पर ,
जहाँ से तबले की थाप ,
पटाखे के शोर के नीचे न दबी .
रंगबिरंगी फुलझड़ियाँ भी ,
दबा ना सकी ,
घुंघरुओं की आवाज .
महफ़िल सजी ,
जाम से जाम टकराते रहे .
उस बीच ,
मेरा दीपक अकेला ,
जलता रहा ,
सिसकियों के बीच ,
गणेश-लक्ष्मी के मूर्ति के सामने .
मेरा दीपक बेचारा ,
जलता रहा अकेला
मेरा दीपक जल नहीं ,
रो रहा था ,
क्यों की ,
आज की रात भी ,
वो दूर नहीं कर सका अँधेरा ,
उनकी ज़िन्दगी से ,
जिनकी जिंदगी में,
पूर्णिमा आती ही नहीं .
मेरा दीपक अकेला ,
जलता रहा अकेला .