।।कुण्डलिया।।आरक्षण की नाव।।

।।कुण्डलिया।।आरक्षण की नाव।।

आरक्षण की नाव में ,डूब रहा है देश ।।
महँगाई के ग्रास से ,बचा नही कुछ शेष ।।
बचा नही कुछ शेष भेष बहुविधि अपनाती ।।
नाव चली कुछ तेज नदी जब जब उफनती ।।
हे “राम” दुखी जन सोच रहे है पेट भरण की ।।
जर्जर है कमजोर नाव यह आरक्षण की ।।

निर्धन है मझधार में ,डूब रहे मन मार ।।
आरक्षण की नाव पर, मिला नही अधिकार ।।
मिला नही अधिकार पार कैसे हो पाते ।।
महँगाई का घूँट रहे पीते चिल्लाते ।।
हे “राम” रुकी न नाव डुबे मारे मन ।।
आरक्षण से और दबे बाकी सब निर्धन ।।

लहरें उफनाने लगी ,भवँर उठ रही तेज ।।
महँगाई की मार से ,कौन करे परहेज ।।
कौन करे परहेज तनिक राहत जब आती ।।
आरक्षण की नाव कुचल उनको है जाती ।।
हे “राम”उबर न पाये गये जो इतने गहरे ।।
पुनः हो गयी शांत चली जो चुनावी लहरे ।।

आरक्षण किसके लिये ,करे फैसला कौन ।।
कर्मठ है हड़ताल पर, निर्धन है सब मौन ।।
निर्धन है सब मौन पहुँच से उनकी दूरी ।।
दिनभर करें अकाज फसी दैनिक मजदूरी ।।
हे “राम” कोई भी जाति नही करती हैं पारण ।।
तो कैसा दुर्भाग्य मिले न क्यों आरक्षण ।।

आती है हरहाल में ,आरक्षण की नाव ।।
मिला न जिनको लाभ तो ,कर जाती है घाव ।।
कर जाती है घाव कुढ़न मन ही मन होती ।।
जाति पांति के बीच द्वेष मन में है बोती ।।
हे”राम” मचा कुहराम प्रजा रहती चिल्लाती ।।
भूख लगे न आँख रातभर नींद न आती ।।

…..R.K.M

3 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 12/09/2015
  2. रकमिश सुल्तानपुरी राम केश मिश्र 12/09/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir 13/09/2015

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