तो अच्छा हो….

जो किसी ने कहा नहीं, मैं वो आवाज सुनता रहा
जो पूरे हो नहीं सके, मैं वो ख्वाब बुनता रहा
जिंदगी में कहाँ जाना था और कहाँ पहुँच गये
जिनकी मंजिल नहीं, मैं उन्हीं राहों पर चलता रहा

आसमां पाने की ख्वाइश में जमीं को देखता रहा
आगे आने की कोशिश में और पीछे छूटता रहा
जिसका जवाब मेरे दिल के कोने में ही छिपा था
मैं उम्र भर लोगों से वो सवाल पूछता रहा

खुद ही अपनी आवाज सुनूं तो अच्छा हो….
ख्वाबों को ख्वाब ही रहने दूं तो अच्छा हो….
क्यूं कहीं पहुँचने का अरमान दिल में रखूं
राहों को ही मंजिल का नाम दे दूं तो अच्छा हो….

आसमां को ही जमीं पर ले आऊँ तो अच्छा हो….
पीछे रहकर भी आगे पहुँच जाऊँ तो अच्छा हो….
सवालों को किनारे छोड़कर दुनिया के लिये
खुद ही अपना जवाब बन जाऊँ तो अच्छा हो….

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/09/2015
  2. डी. के. निवातिया D K Nivatiyan 15/09/2015
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 15/09/2015

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