इंसानियत को ही धर्म बनाओ

इंसानियत को ही धर्म बनाओ

रचाया जिसने संसार है सारा
वोः भी सोच सोच के हारा
शायद सबक सीखने को
हर भेद भाव. मिटने को
रची उसने भी नयी. कहानी
जब हद से गुज़र जाती है नादानी
तब हर सू छा जाती है वीरानी
बदलाव सा हम देख रहे हैं
बढ़ते हुए कहीं रुक से गये हैं
जल्द ही.कुछ ऐसा होगा
सोच बदलने जैसा होगा
नफरत की जगह होगा प्यार
न होगा इंसानियत का व्योपार
भुला कर हर भेद भाव को
प्यार की राह पर बढ़ जाएंगे
सबको सबसे होगी हमदर्दी
बैर वैर सब मिट जाएंगे
ईश्वर, ईसा हो यां हो ख़ुदा
वोः ताक़त नहीं किसी से जुदा
हम उसे जिस रूप में देखें
वोः तो है कण कण में बसा
अपने २ धर्मो से उठ कर
इंसानियत को ही धर्म बनाओ
जब हो, इंसान तो
इंसानियत का फ़र्ज़ निभाओ

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया D K 10/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/09/2015

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