धोखे

कोई जब अपने लोगों से रिश्तों में धोखे खाता है
सीने में जलन सी होती है और चैन कहाँ फिर आता है
ऐसे लोगों की कही हुई हर बात झूठ सी लगती है
सदियों से फिर भी ये फितरत सच्चे इन्सां को ठगती है
कैसे बदलें हम अपनी आदत अपनों को अपना समझने की
कब छूटेगी ये सोच हमारी सबके लिए उलझने की
मन करता है ये कभी कभी मैं सब कुछ छोड़ चला जाऊ
फिर से नव जीवन शुरू करू और निस्वार्थ प्रेम को अपनाऊ

शिशिर “मधुकर”

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