निस्वार्थ प्रेम

सोचनें पर जब तुम ये मजबूर हो जाओ
क्यों मुझको आखिर इतना चाहता है वो
प्रेम में समझो किसी ने पा लिया उसे
कृष्ण की चाहत में राधा को मिला जो
स्वार्थ का रिश्तों में होता नहीं जब नाम
मीरा कलयुग में भी होती नहीं बदनाम।

शिशिर “मधुकर”

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/09/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/09/2015

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