सीमा

है सीमा जिस्मो की माना
पर मन की सीमा कोई नहीं
पग थक जाते हैं चलते चलते
कहाँ उड़ता है मन पता नहीं
पल में यहाँ पल में वहां
जाता है बेटोक जहाँ
नहीं थकता कभी यह उड़ाते २
थक जाते हम चलते चलते
तन के ऊपर मन है भारी
मन के ऊपर कोई नहीं
कहते हैं सब मन है बांवरा
भटकता रहता इधर उधर
कब आता है कब जाता है
इसका भी कुछ पता नहीं
पल में तोला पल में माशा
करता है कभी कुछ आशा
होती कभी भरपूर निराशा
जाता डूब फिर यह गम में
कभी चहके मोर हो वन में
पता न इसका कोई ठिकाना
कैसे पकड़ें कोई बताना
यह छलिया है
कभी छलता है कभी ढलता है
मोह से है भरपूर भी यह
रहता मद से चूर भी यह
भाती इसको सब रंग रलियाँ
न इसके जैसा कोई छलिया
स्वाद हैं इसके बड़े निराले
होता खुश. यह मीठा चख के
सुने धुन कोई प्यारी प्यारी
नहीं रहता बस इसको खुद पे
आँखों से देखे रूप सलोने
डोले फिर ये बड़े हिंडोले
छुअन से कहाँ बच पता यह
कामनाओं से भी रहे ओत प्रोत ये
कस कर थामो इसको ऐसे
न भागे घोडा सरपट जैसे

One Response

  1. डी. के. निवातिया D K 09/09/2015

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