।।ग़ज़ल।।मेरे प्यार का मुक़दमा था।।

।।ग़ज़ल।।मेरे प्यार का मुक़दमा था।।

तेरी ज़मानत ,मैं गुनेहगार, का मुक़दमा था ।।
मेरे रंजोगम से तेरे प्यार का मुकदमा था ।।

पैरवी कर आँखों ने क्या हाल बना रखा है ।।
किसके थे अश्क़ वो ,अधिकार का मुक़दमा था।।

हर बार मेरी पैमाइशे नाक़ाम होती ही रही ।।
अदालत तो तेरी ही थी ,बेकार का मुक़दमा था ।।

तारीख़ दर तारीख़ बदलती रही तेरे प्यार की ।।
तेरी आजमाइस ,मेरे एतबार का मुकदमा था ।।

आँखों ही आँखों से हर बार ज़िरह होती रही ।।
मेरी ख़्वाहिशे तेरी शौक़ में गयीं हार, का मुक़दमा था ।।

मुझे क्या मालुम ,फ़ैसले इश्क़ में होते नही ।।
मैं उनके कशिश का हो गया शिकार ,का मुक़दमा था।।

……R.K.M

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shsishir 06/09/2015
  2. रकमिश सुल्तानपुरी राम केश मिश्र 06/09/2015
  3. डी. के. निवातिया D K Nivatiya 07/09/2015
  4. रकमिश सुल्तानपुरी राम केश मिश्र 07/09/2015

Leave a Reply