क़हर

कलयुग में इंसान क़हर-ए-आफ़ताब बन
कहीं कहर बरसाने निकल पड़ा है ….
अपने मुकम्मल-ए-नियाज़ के लिए
हैवानियत का मुखौटा डाले निकल पड़ा है ….
मर्यादा के लकीरों को लांघता हुआ
पाकीज़ा दामन को नापाक करने निकल पड़ा है…..
शैतानी पिजड़े को हाथ में लेते हुए
मासूमियत की निगाहों को कैद करने निकल पड़ा है …..
अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए
ज़ुल्मों का कहर बरसाने निकल पड़ा है …..
ख़ुदा के ख़ौफ़ को नज़र अंदाज़ करते हुए
अपने चंद ख्वाहिशों के लिए
जन्नत को जहन्नुम बनाने निकल पड़ा है…….
रहम और मानवता का क़त्ल कर
इंसानियत का जनाज़ा कंधे पर रखकर निकल पड़ा है …..
कलयुग में इंसान क़हर-ए-आफ़ताब बन
कहीं कहर बरसाने निकल पड़ा है ….

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  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 04/09/2015

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