शोक से आज फिर गमगीन है ये आँखे

शोक से आज फिर गमगीन है ये आँखे
उड़ चला है परिंदा कोई आज इस जहाँ से
सहादत को उमड़ते उस जनसैलाब का
आज फिर से ऐतबार करती है ये आँखे ,
शब्द पड़ रहे काम आज एक बार फिर
उसकी रेहनुमाययों को बयां करने को
दिल बैठ गया संताप से कही जाकर एक ओर
दर्द अश्कों से बयां कर रही है आज फिर ये आँखे ,
एक मुद्ददत से याद कर तुझे ठहर जाऊ कहीं
दिल में जोर की नुमाइश भी आज इतनी नहीं
तेरी याद के दर्द से शिथिल पड़े उन अवयवो को
आज अश्कों से फिर सँभालने को बेताब है ये आँखे ,
धुंध निगाहों पे पड़ी पानी की उस बून्द से
अठखेलियां खेलती उस पर पलकों की मेल से
नाकाम कोशिशे करती उन आंसुओ को रोकने की
जिनमे चंद खुशियो के सपने संजोती थी ये आँखे ,
आज फिर गर्दिशों में तन्हाई सी बयार छायी है
टूटते उन कसमों की याद फिर से आई है
आजमाने को फिर से खामोश लब्जो की इन्तहां
अश्कों के भंवर में आज फिर उलझी है आँखे |

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/09/2015
  2. padam shree padam shree 17/09/2015

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