समय ही था

उलझा जो काँटों से दमान
तो तार तार कर गया
उलझनों में ऐसे उलझे हम
वो वार कई बार कर गया
कुछ भी नहीं आसां यहाँ
पर आना आंसूओं का
दर्दे दिल बयां कर गया
खिली रहती थी मुस्कराहट
जो होठों पे सदा
आहों से भर साँसों को
हर ख़ुशी वोः तबाह कर गया
हर आरज़ू हर जुस्तजू
बेमाने हो गयी
आयी बहार को ,पल भर में
वो फ़नाह कर गया
बेबसी थी कैसी ,हम कैसे कहें
गिराने को आशिआना
हर तबाही का वो सामां कर गया
न था कोई और, समय ही था
जो आया ज़लज़ले की तरह
और हमें हैरां परेशां कर गया
फूलों से भी बचा रखा था जो
दामन वो तार तार कर गया

7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/09/2015
  2. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 02/09/2015
  3. Hitesh Kumar Sharma Hitesh Kumar Sharma 03/09/2015
    • manisha 03/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 05/09/2015
  4. manisha 03/09/2015
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 05/09/2015

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