!! मंहगाई !! [गजल]

बेबस और बेजान हैं , सब अपने घर वार मे !
आंसू ले दस्तक दिये , सावन के त्योहार ने !!

अच्छे दिन की होड मे ,न्योत दिये महमान ,
हालत पस्ता कर गई , मंहगाई की मार ने !!

लेखा जोखा लगा लगा कर , चिन्तन करते भाव ,
अंक गणित हमे सिखा गई , मंहगाई उपहार मे !!

खा पी कर मोटे हुए , जब हल्के थे दाम ,
डाइटिंग करना सिखा गई , मंहगाई एक वार मे !!

मन की टेंसन दूर हुई , हुआ रक्तचाप सामान्य ,
धंधा मंदा पड गया , मंदी के व्यापार मे !!

गर्दी ट्रेन पे कम हुई , सफर हुआ आसान ,
सब कदम फूंक-२ कर रखते , इस मंहगे बाजार मे !!

कवि –अनुज तिवारी

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/09/2015
    • Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 03/09/2015
  2. C.M. Sharma C.m sharma(babbu) 26/10/2016

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