राधा कृष्ण

कुण्ड में जल , जल में कमल
उसमे नहाती राधे मृगनयनी
तरणि का तट ,तरुओ में वट
वट ओठ छिपे शशस्यनी
वो रति सम मूरत
वो यौवन की मनमोहनी चाल
कान्हा संग मुरली सुने
रास लीला से जिनकी
शोभित है ब्रजताल
कभी जल में क्रीड़ा
तो कभी क्रीड़ा में जल
कभी दिखे सहस्त्र रूप में
कभी हो जाये ओझल
कहे राधा,हे कान्हा
काहे न लिए संग फेर
शादी होत दो जनो की
पर हम कहाँ है गैर