कर्मो की सजा

न जाने कितने लोग ,
ज़िन्दगी को पीछे छोड़ना चाहते हैं.
ज़िन्दगी की गति से भी तेज दौड़ना चाहतें है .
हवा से बातेें करना चाहते हैं ,
घंटो मॉल ,मल्टीप्लेक्स में समय बिताना चाहते हैं ,
फेसबुक ,ट्विटर ,व्हाट्सप्प पर ,
दुनिया बाहर की बातें करना चाहतें हैं .
अपने बच्चो के लिए डिब्बाबंद दूध लेना चाहते हैं .
उन्हें अँधेरा पसंद नहीं आता ,
इसलिए ,
अपने घरो को रंग बिरंगे बल्बो से जगमगा देना चाहतें हैं
इन सब के बीच वो ,
भूल जाते हैं उन्हें ,
जिनकी आँखों ने बरसो से झपकियाँ नहीं ली ,
जिनके गले प्यासे हैं ,
उनके हाथों से गंगाजल पीने के लिए ,
जिनके कंधो पे बैठकर ज़िन्दगी के मेले देखे ,
उनकी चिता को अपना कन्धा भी नहीं देना चाहते .
ए. सी की हवा भी अब उन्हें रास नहीं आता .
बिसलेरी की बोतले भी उनकी प्यास नहीं बुझा पाती
कोई रात ,
उन्हें थपकियाँ दे कर सुला नहीं पाती .
कोई सुबह
उन्हें मुस्करा नहीं पाती .
शायद ,
इससे बड़ी .
कोई ,
उनके इन कर्मो की सजा नहीं होती .

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