फिर हुआ दंगा / कविता

फिर हुआ दंगा है देखो आज मेरे देश में |

फिर हुआ इंसान नंगा आज मेरे देश में ||

लग गए हैं लोग लिखने,
खुद ही अपनी किस्मते |
बाज़ार में आए उतर हैं,
तय करने कीमतें |
लड़-झगड़ रहा है इंसान,
इंसान से आजकल,
कोई नहीं चाहत में रखता,
शांति और राहतें ||

फिर हुए गरीब कितने आज मेरे देश में ||

फिर हुआ इंसान नंगा आज मेरे देश में ||

फिर चली गोली कहीं,
फिर मरा बेटा कोई |
फिर जला घर है किसी का,
फिर तड़पता है कोई,
फिर लगा कर्फ़्यू है देखो,
फिर हुई सड़कें सूनी,
फिर रचा गया खेल खूनी,
फिर हुई छलनी छाती ||

रक्त का दरिया बहा फिर आज मेरे देश में ||

फिर हुआ इंसान नंगा आज मेरे देश में ||

# हाल ही में हुए गुजरात आरक्षण दंगों पर आधारित है |

# महेश कुमार कुलदीप ‘माही’

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 31/08/2015
    • mkkuldeep mahesh kumar kuldeep 01/09/2015

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