साकी तेरा काम है कैसा

कैसा जीवन यापन करता
वो सबके पात्रों को भरता
समाज और परिवार के साथ
समय बिताने को वो मरता .

दिनचर्या को अपनी भूलकर
आधुनिक जीवन का हिस्सा बनकर
लोगो का मनोरंजन करके
रोज कोई नया किस्सा बनकर

साकी तेरा काम है कैसा
दुनिया मे बदनाम है जैसा

रक्षाबंधन का बंधन भी
थाली मे रखा चन्दन भी
दीपमाला आयी बुझने को
सखी के पैरो की छनछन भी

अब बहुत गए दिन बीते रातें
कल फिर भी सुधरा न तेरा
उलटी चक्री समय घुमाए
आखिर मे कुछ भी न पाये

प्रकृति के खिलाफ चलोगे
स्वास्थ्य तेरा मजधार मे आये .
मंत्र न ऐसा कोई अबतक
जो तेरा संतुलन कर पाये

सूर्योदय से बैर है जैसा
साकी तेरा काम है कैसा

हिसाब गलत हो जाये न बूँद का
चाहे सारे प्रहर बीत जाए
कल तो शुरू हो चूका आज ही
धन आये पर करुणा न आये

इनाम जो पाया सेवा देके
अतिथि को भी हर क्षण भटकाया
उसके होश का सौदा करता
तेरे पाप को वो नहीं भरता

दुनिया मे सबकुछ नहीं है पैसा
साकी तेरा काम है कैसा

सावन के झरने रूठे है
वो आश्चर्य मे पड़े हुए है
नया साल कब आया बीता
हम उस कोने मे ही खड़े है .

सब चले गए जगह से ,
आनंद की अनुभूति करके
लक्ष्मी का उपयोग न समझे
जलकर उसको बभूती करके .

आजाद हुआ फिर लगता क्यों ये , चारो तरफ शमशान है जैसा
साकी तेरा काम है कैसा

One Response

Leave a Reply