अधेड़ उम्र के जीवन में चिंता बहुत सताती है

अधेड़ उम्र के जीवन में
चिंता बहुत सताती है
एक पल को जंदगी भारी,
और मौत प्यारी लग जाती है
सफर भी रोज का है यहाँ
और जाना भी कहीं नहीं
माथे से गिरती पसीने की बुँदे
और चेहरे पे पड़ती झुर्रिया
जीवन के संघर्ष को बतलाती है ,
रोज के गीले शिकवे बीबी के
बच्चों के बढ़ती जरूरते
हर वक़्त एहसास ये दिलाती है
उठ जल्दी ,चल कर्म पथ पर अपने ,
बाकि है सफर बहुत ,
और चलना है दूर तक
बेटी बढ़ती उम्र और ,
बच्चे की शिक्षा का बढ़ता व्यय
खाने की थाली पर बीबी बतलाती है |
चिंता नहीं मुझको उनकी
कुछ ऐसा कह सुनाती है,
खाने से कम, बातों से ही पेट भर जाता है
आँखे मिजकर उठ जाता है
उठ चलता फिर शयनकक्ष की ओर,
शुरू करना है अधूरा सफर कल का पुनः
सोच यहीं निद्रा को गले लगाता है.|

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