हाय रे,बेरोजगारी की मार

हाय रे,बेरोजगारी की मार
पड़ रही कितनी अपार
व्यक्ति डूबा जा रहा कर्ज में
और जी रहा जिंदगी धक्कामार
माँ की स्नेहल बेबश आँखे बेटे को देखती है
उसकी दौड़ भाग भरे जीवन को नापती है
यहाँ घर में कहीं दो रोटी है ,तो चावल नहीं
बेटे की दिन दशा देख कुछ मांगती भी नहीं
की नमक है तो खाने को दाल नहीँ,
जिंदगी खुद ही हो रही छिन्नतार
हाय रे ,बेरोजगारी की मार….
दुर्दिन उसके जीवन को
कर्ज से टूटे उन कंधो को
देती है बंधा ढांढस वह
ताकि मुक्त हो वह इस चिंता के विष से,
आँखों में आंसुओ का सैलाब है ,
पर चेहरे पे कहीं सिकन भी नहीं
दिल में दर्द का तूफान है
पर उम्मीद की कोई आस नहीं
अक्सर ढूंढा करती है उसकी जेबों में
की कही दो-चार पैसे की जगह सल्फास तो नहीं ..

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