आज का मानव अनुगामी है कागज के टुकड़ो का

आज का मानव अनुगामी है
कागज के टुकड़ो का ,
सब भूल गया वह इस क्षण में ,
रहते थे कभी एक दिन सब साथ में
दिनभर अपने कार्यों में डूबे रहते
खेत खलिहानों में जूझा करते
होती थी जब शाम सुहानी,
लौट चला करते थे घर की ओर
चरागाहों से पशुओं का झुण्ड ,
रम्हाते हुए लौटते है उन नन्हे बछड़ो की ओर ,
इन पीपल के वृक्षों के निचे,
होते थे सब लोग इकठ्ठा ,
अपनी कहते, सब की भी सुनते
एक-दूसरे के भावो को समझते
दुःख में दुसरो का साथ देते थे ,
फिर हँसते -गाते,भोजन करते
बिस्तर पे सो जाते थे ,
ना रहा अब प्रेम आत्मीय जनो के प्रति,
चंद सुखो के लिए छोड़ दिया हमने अपनों का दमन ,
अब कहाँ रहा वह प्रेम ,कहाँ रहा वह जन
कहाँ रही हृदयों की एकतता
ना रही दिलों में अब समता ,
है तेजी से भाग रहे सब समय के साथ
एक पल भी ना किसी को फुर्सत है ,
दुसरो के दुखों में शोक मानना
होना सबकी खुशियों में शामिल ,
ना रही अब वो सद्भावना ,
अब कहाँ किसी को किसी की जरुरत है
होगा भागीदार वह इस दुनिया के विनाश का
आज का मानव अनुगामी है,
कागज के टुकड़ो का ..

2 Comments

  1. Amitu Sharma 01/09/2015

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